Vijay Mallya
विजय माल्या का यह बयान कई मायनों में चर्चा में रहा है। इसमें उन्होंने खुद को 'भगोड़ा' या 'चोर' कहे जाने को गलत ठहराया और दावा किया कि उन्होंने भारत छोड़ने से पहले तत्कालीन वित्त मंत्री अरुण जेटली से मिलने की कोशिश की थी।
"मैं भगोड़ा नहीं हूं"
माल्या ने कहा कि वे देश छोड़कर भागे नहीं थे, बल्कि वह लंदन बिजनेस ट्रिप पर गए थे, और उसके बाद उनकी छवि जानबूझकर एक भगोड़े की तरह बना दी गई।
"जेटली को बताया था कि जा रहा हूं"
उनका दावा है कि उन्होंने संसद में अरुण जेटली को बताया था कि वो देश छोड़ने वाले हैं, और उन्होंने एक बैठक के लिए कहा था, लेकिन उन्हें सिर्फ 1 मिनट मिला।
📝 हालांकि, जेटली ने जवाब में कहा था कि माल्या ने संसद के गलियारे में अचानक संपर्क किया, और उन्हें स्पष्ट रूप से कह दिया गया कि वह बैंकों से निपटें।
💰 "6200 करोड़ के बदले 14,000 करोड़ वसूले गए"
माल्या का कहना है कि उन्होंने बैंकों को 6200 करोड़ रुपये का सेटलमेंट ऑफर दिया था, लेकिन बैंकों ने मना कर दिया।
अब बैंकों ने उनकी संपत्ति बेचकर 14,000 करोड़ रुपये वसूल लिए, जो उनके मुताबिक "ज्यादा" है।
वे यह भी कहते हैं कि अगर बैंकों को सिर्फ पैसे चाहिए थे, तो उनका ऑफर मंजूर किया जा सकता था।
विजय माल्या का तर्क है कि उनकी मंशा पैसे लौटाने की थी, और उन्होंने कानूनी रूप से पेशकशें भी की थीं, पर उन्हें न्याय नहीं मिला।
वहीं, बैंक और सरकारी पक्ष मानते हैं कि माल्या ने जानबूझकर लोन नहीं चुकाया और वह जवाबदेही से बचने के लिए विदेश भाग गए।
यह मामला कानूनी, राजनीतिक और नैतिक जटिलताओं से भरा है। जनता और न्यायालय दोनों अपनी-अपनी नजरों से इस पर नजर रखते रहे हैं।
अगर चाहें, मैं आपको माल्या केस का टाइमलाइन, या सेटलमेंट ऑफर के दस्तावेज़ी तथ्य भी बता सकता हूं।
यह बयान विजय माल्या ने अपने ऊपर लगे भगोड़ा आर्थिक अपराधी और चोरी के आरोपों के जवाब में दिया था। इसमें वह स्पष्ट करना चाहते हैं कि:
2 मार्च 2016 को वह FIA (Federation of Indian Airlines) की मीटिंग के सिलसिले में जेनेवा जा रहे थे और इसके लिए लंदन होते हुए यात्रा कर रहे थे।
उनका कहना है कि उन्होंने तत्कालीन वित्त मंत्री अरुण जेटली को पहले ही सूचित कर दिया था कि वह विदेश जा रहे हैं — यानी वह चुपचाप नहीं भागे।
लेकिन जब उनका पासपोर्ट रद्द कर दिया गया, तो वे लंदन में ही फंस गए और लौट नहीं सके।
वह यह भी कहते हैं कि यह कोई "एस्केप प्लान" नहीं था और उन्हें “चोर” कहना गलत है, क्योंकि वे अपनी तरफ से बैंकों का पैसा चुकाने को तैयार थे।
इस बयान का निहितार्थ:
वह खुद को भगोड़ा मानने से इनकार कर रहे हैं और यह जताना चाह रहे हैं कि वह कानून से भागे नहीं, बल्कि विवशता में विदेश में रुके।
सरकार को पहले से सूचना देने का दावा, इस बात को बल देने की कोशिश है कि वह पारदर्शी थे और कोई छुपाव नहीं था।
वह अपनी छवि सुधारने की कोशिश में हैं, खासकर यह कहकर कि "मुझे चोर कहना गलत है।"
यदि आप चाहें तो मैं इस बयान का विश्लेषण, कानूनी दृष्टिकोण या सार्वजनिक प्रतिक्रिया भी विस्तार से बता सकता हूं।
यह बयान विजय माल्या का है, जो करीब 6,200 करोड़ रुपए के बैंक लोन फ्रॉड के मामले में आरोपी हैं। ब्याज और अन्य शुल्क जोड़ने के बाद यह राशि बढ़कर लगभग 9,000 करोड़ रुपए हो जाती है। इसके अलावा, IDBI बैंक से लिए गए 900 करोड़ रुपए के लोन डिफॉल्ट को लेकर भी उनके खिलाफ एक अलग मामला दर्ज है।
"मीडिया से नौ साल की खामोशी के बाद, विजय माल्या ने यूट्यूबर राज शमानी के पॉडकास्ट पर चुप्पी तोड़ी। चार घंटे की इस गहरी बातचीत में उन्होंने अपनी जिंदगी के अनकहे पहलुओं, कारोबारी फैसलों, किंगफिशर एयरलाइंस के पतन, कर्मचारियों की लंबित सैलरी और कानूनी जंग के बारे में खुलकर बात की।"
बचपन और शिक्षा
जन्म: विजय माल्या का जन्म 18 दिसंबर 1955 को कोलकाता (तब कलकत्ता), पश्चिम बंगाल में हुआ था।
परिवार: वे प्रसिद्ध उद्योगपति वित्तापति माल्या के पुत्र हैं, जो United Breweries Group के संस्थापक थे।
शिक्षा:
प्रारंभिक शिक्षा कोलकाता और बेंगलुरु में हुई।
उन्होंने सेंट ज़ेवियर्स कॉलेज, कोलकाता से बी.कॉम (ऑनर्स) की डिग्री ली।
कॉलेज के दौरान वे काफी सक्रिय और आत्मविश्वासी छात्र माने जाते थे।
👨💼 शुरुआती करियर
कम उम्र में जिम्मेदारी:
1983 में, अपने पिता की मृत्यु के बाद, सिर्फ 28 साल की उम्र में विजय माल्या ने United Breweries Group (UB Group) की कमान संभाली।
तेजी से विस्तार:
उन्होंने पारंपरिक शराब कारोबार से आगे बढ़ते हुए समूह को विविध क्षेत्रों में फैलाया – जैसे कि रसायन, फार्मास्यूटिकल्स, इंजीनियरिंग, मीडिया, एविएशन और मनोरंजन।
उन्होंने "किंगफिशर" ब्रांड को एक ग्लैमरस और प्रीमियम छवि दी – खासकर बीयर और बाद में एयरलाइंस के ज़रिए।
अंतरराष्ट्रीय पहचान:
उन्होंने कई विदेशी कंपनियों का अधिग्रहण किया, जैसे कि Whyte & Mackay (स्कॉटलैंड)।
उन्हें "ब्रांड किंग" भी कहा जाता था, क्योंकि उन्होंने भारतीय उपभोक्ता बाजार में ब्रांडिंग की नई मिसाल कायम की।
📌 विशेष बातें
विजय माल्या का व्यक्तित्व शुरू से ही करिश्माई, जोखिम लेने वाला, और ग्लैमर-प्रेमी रहा है।
उन्हें राजनीति में भी दिलचस्पी थी – वे राज्यसभा सदस्य भी रह चुके हैं (एक निर्दलीय के रूप में, बाद में समर्थन बीजेपी से)।
वे फॉर्मूला 1 टीम "Force India" के मालिक भी रहे।
विजय माल्या का प्रारंभिक जीवन और करियर की शुरुआत
जन्म और पारिवारिक पृष्ठभूमि:
विजय माल्या का जन्म कोलकाता में हुआ। उनके पिता विट्ठल माल्या यूनाइटेड ब्रेवरीज (UB) ग्रुप के चेयरमैन थे। व्यवसायिक माहौल में पले-बढ़े विजय का बचपन सख्त अनुशासन में गुज़रा। उनके पिता ने साफ़ कहा था:
"अगर मेहनत नहीं करोगे, तो मेरे बिजनेस में तुम्हारे लिए कोई जगह नहीं।"
शिक्षा:
विजय माल्या ने कोलकाता के प्रतिष्ठित सेंट जेवियर्स कॉलेज से कॉमर्स में स्नातक (B.Com) की डिग्री ली।
करियर की शुरुआत:
पढ़ाई पूरी करने के बाद, उन्होंने अपने पिता के ग्रुप में एक साधारण ट्रेनी के रूप में काम शुरू किया। उन्हें केवल ₹400 की मासिक तनख्वाह मिलती थी, जो यह दर्शाता है कि उन्हें विशेष रियायत नहीं दी गई।
18 साल की उम्र में CEO:
बहुत कम उम्र—महज 18 साल में—उन्हें एक छोटी कंपनी का CEO बना दिया गया। यह जिम्मेदारी उनके नेतृत्व कौशल और आत्मविश्वास की शुरुआत का संकेत देती है।
विजय माल्या ने UB ग्रुप और किंगफिशर ब्रांड को कामयाबी की ऊंचाइयों तक पहुंचाने के लिए कई रणनीतिक और मार्केटिंग फैसले लिए। नीचे इनके मुख्य पहलुओं को बताया गया है:
🏢 UB ग्रुप की कामयाबी:
1. ब्रांडिंग और प्रीमियम इमेज:
माल्या ने UB ग्रुप के अधीन आने वाले प्रोडक्ट्स, खासकर किंगफिशर बीयर, को प्रीमियम और स्टाइलिश ब्रांड के रूप में पेश किया।
उन्होंने किंगफिशर को सिर्फ एक शराब ब्रांड नहीं, बल्कि एक “लाइफस्टाइल ब्रांड” बना दिया – जिसका संबंध पार्टी, ग्लैमर और हाई-स्टैंडर्ड से था।
2. अंतरराष्ट्रीय विस्तार:
माल्या ने UB ग्रुप की कंपनियों को विदेशों में भी फैलाया।
उन्होंने कई विदेशी शराब कंपनियों का अधिग्रहण किया, जैसे Whyte & Mackay (स्कॉटलैंड की मशहूर व्हिस्की कंपनी)।
3. मार्केट शेयर पर कब्ज़ा:
किंगफिशर बीयर ने भारत के बीयर मार्केट में लगभग 50% से ज्यादा हिस्सेदारी हासिल की, जो अपने आप में एक बड़ी उपलब्धि है।
✈️ किंगफिशर एयरलाइंस की शुरुआत और सफलता:
1. प्रीमियम उड़ान अनुभव:
किंगफिशर एयरलाइंस की शुरुआत 2005 में की गई, और इसका उद्देश्य था यात्रियों को लग्ज़री और बेहतरीन सर्विस देना।
हर सीट पर पर्सनल स्क्रीन, सुंदर केबिन क्रू, शानदार खाना और “फ्लाइंग एक्सपीरियंस” को ब्रांड की तरह बेचना – ये सब किंगफिशर को बाकी एयरलाइंस से अलग बनाते थे।
2. आक्रामक मार्केटिंग:
उन्होंने एयरलाइंस के प्रचार में भारी निवेश किया। IPL, फॉर्मूला 1 और फैशन शो जैसे ग्लैमरस प्लेटफॉर्म पर ब्रांड को प्रमोट किया।
किंगफिशर कैलेंडर और पार्टियों के ज़रिए “लाइफस्टाइल” का सशक्त प्रचार किया गया।
3. फ्लीट और नेटवर्क विस्तार:
शुरुआत में डोमेस्टिक फ्लाइट्स के बाद इंटरनेशनल सेक्टर में भी प्रवेश किया गया।
उन्होंने एयर डेक्कन (low-cost airline) का अधिग्रहण किया, जिससे नेटवर्क का विस्तार हुआ।
📊 निष्कर्ष:
माल्या ने ब्रांडिंग, स्टाइल और बड़े विज़न के ज़रिए UB ग्रुप और किंगफिशर को ग्लैमरस और मशहूर बना दिया।
हालांकि किंगफिशर एयरलाइंस बाद में घाटे में गई, लेकिन इसके शुरुआती सालों में उसने इंडियन एविएशन सेक्टर को एक नई दिशा दी।
"यह सब रातोंरात नहीं हुआ। 1983 में, जब मैं केवल 27 साल का था और मेरे पिता का निधन हुआ, तब मैंने यूनाइटेड ब्रेवरीज़ (UB) ग्रुप की कमान संभाली। किंगफिशर ब्रांड को लोकप्रिय बनाने के लिए मैंने उसकी पैकेजिंग को और भी आकर्षक बनाया और म्यूजिक व फैशन इवेंट्स को प्रायोजित किया, जिससे ब्रांड को जबरदस्त पहचान और लोकप्रियता मिली।"
धीरे-धीरे हमारी सेल्स बढ़ने लगी। ये कोई जादू या अचानक की गई चाल नहीं थी। हमने अपने ब्रांड को समझा, ग्राहक की पसंद को पहचाना, और मार्केटिंग में सही रणनीति अपनाई। हमने टीवी विज्ञापन, इवेंट स्पॉन्सरशिप, और एक आकर्षक ब्रांड इमेज पर फोकस किया। इसका असर साफ दिखा—लोग न सिर्फ हमारे प्रोडक्ट को पहचानने लगे, बल्कि पसंद भी करने लगे।
आज किंगफिशर बीयर भारत की सबसे लोकप्रिय बीयर बन चुकी है, और इसका 52% मार्केट शेयर इस बात का सबूत है कि लगातार मेहनत, सही ब्रांडिंग और ग्राहकों के साथ मजबूत कनेक्शन कैसे कमाल कर सकते हैं।
"मैकडॉवेल्स नंबर 1 व्हिस्की को दुनिया का नंबर 1 ब्रांड बनाया। 1988 में बर्जर पेंट्स का अधिग्रहण किया, उसे 25 देशों में विस्तार दिया और मुनाफे के साथ सफलतापूर्वक बेचा।"
"ब्रांड निर्माण और अंतरराष्ट्रीय विस्तार में महारत का परिचय देते हुए, विजय माल्या ने मैकडॉवेल्स नंबर 1 को वैश्विक स्तर पर सबसे लोकप्रिय व्हिस्की ब्रांड बना दिया। वहीं, बर्जर पेंट्स के अधिग्रहण और वैश्विक विस्तार के बाद, उसे मुनाफे के साथ बेचकर एक और बिज़नेस मास्टरस्ट्रोक दिया।"
शुरुआत: किंगफिशर एयरलाइंस का उदय (2005 - 2008)
शुरुआत:
किंगफिशर एयरलाइंस की शुरुआत 9 मई 2005 को विजय माल्या ने की थी। इसे एक प्रीमियम और लग्ज़री एयरलाइन के तौर पर लॉन्च किया गया।
मुख्य उद्देश्य:
भारतीय यात्रियों को एक "फाइव स्टार" फ्लाइंग एक्सपीरियंस देना। इसमें आकर्षक एयर होस्टेस, इन-फ्लाइट एंटरटेनमेंट, और खूबसूरत पैकेजिंग जैसी सुविधाएं दी गईं।
जल्द ही लोकप्रियता:
शानदार मार्केटिंग, ब्रांडिंग और माल्या की पर्सनैलिटी के चलते किंगफिशर जल्दी ही एक स्टाइलिश ब्रांड बन गया।
2007-08 तक यह भारत की दूसरी सबसे बड़ी एयरलाइन बन गई।
💸 पतन की वजहें: किंगफिशर की गिरावट (2008 - 2012)
1. गलत बिजनेस फैसले:
2007 में माल्या ने Deccan एयरलाइंस को खरीद लिया ताकि इंटरनेशनल उड़ानों की अनुमति मिल सके।
इससे कंपनी का खर्च बढ़ गया लेकिन रेवेन्यू में खास इजाफा नहीं हुआ।
2. 2008 का ग्लोबल फाइनेंशियल क्राइसिस:
इस आर्थिक मंदी के चलते यात्रियों की संख्या और एविएशन सेक्टर दोनों को झटका लगा।
किंगफिशर की फंडिंग पर भी असर पड़ा।
3. उधारी और कर्ज का बढ़ना:
कंपनी ने बड़े-बड़े खर्चे किए – नई एयरक्राफ्ट, हाई-एंड सर्विस, भारी सैलरी स्ट्रक्चर।
इन सबको चलाने के लिए बैंकों से हजारों करोड़ का कर्ज लिया गया।
4. ऑपरेशन में लगातार नुकसान:
किंगफिशर की ज्यादातर उड़ानें घाटे में चल रही थीं।
फ्यूल की कीमतें बढ़ रही थीं लेकिन टिकट की कीमतें कम थीं (ताकि प्रतिस्पर्धा में बने रहें)।
5. सरकारी नियम और टैक्स बोझ:
भारत में एविएशन इंडस्ट्री पर टैक्स बोझ अधिक था।
किंगफिशर को कई बार टैक्स और ईंधन आपूर्ति में दिक्कतें आईं।
6. माल्या की पर्सनल ब्रांडिंग बनाम फोकस:
विजय माल्या खुद एक ग्लैमरस लाइफस्टाइल के लिए मशहूर थे – IPL टीम, फॉर्मूला वन टीम, पार्टीज़।
आलोचना हुई कि उन्होंने एयरलाइन पर पूरा फोकस नहीं किया।
🛑 अंतत: बंद होना (2012)
17 अक्टूबर 2012 को DGCA (नागर विमानन महानिदेशालय) ने किंगफिशर एयरलाइंस का लाइसेंस सस्पेंड कर दिया।
कंपनी 2012 तक बैंकों का करीब 9000 करोड़ रुपये की डिफॉल्ट में चली गई।
कर्मचारियों को सैलरी नहीं मिली, और करीब 3000 लोगों की नौकरियां चली गईं।
✍️ निष्कर्ष:
किंगफिशर का पतन महज एक कारोबारी असफलता नहीं था, यह दिखाता है कि:
ग्लैमर और ब्रांडिंग से कोई बिजनेस नहीं चलता अगर फाइनेंशियल अनुशासन, सतत रणनीति, और पारदर्शिता न हो।
भावनात्मक फैसले (जैसे Deccan को खरीदना) और ओवरएक्सपेंशन नुकसानदेह हो सकते हैं।
किंगफिशर एयरलाइंस का उदय और प्रारंभिक सफलता:
2005 में विजय माल्या ने अपने बेटे सिद्धार्थ के 18वें जन्मदिन के अवसर पर किंगफिशर एयरलाइंस की शुरुआत की। उनका उद्देश्य था भारत में यात्रियों को एक प्रीमियम और लक्ज़री फ्लाइंग अनुभव देना, जैसा उस समय तक भारतीय एविएशन सेक्टर में आम नहीं था। एयरलाइंस की ब्रांडिंग, केबिन क्रू की यूनिफॉर्म, और ऑनबोर्ड सुविधाएं इसे एक अलग पहचान देती थीं।
इसने बहुत जल्दी लोकप्रियता हासिल की और 2008 तक किंगफिशर भारत की सबसे बड़ी प्राइवेट एयरलाइन बन गई। इसकी छवि एक ग्लैमरस और प्रीमियम ब्रांड की थी।
गिरावट की शुरुआत:
लेकिन 2008 में वैश्विक आर्थिक मंदी (Global Financial Crisis) आई, जिससे दुनियाभर की अर्थव्यवस्थाएं प्रभावित हुईं। भारत भी इससे अछूता नहीं रहा। निवेश की कमी, महंगा ईंधन, और बढ़ती लागतों के कारण एविएशन सेक्टर पर बुरा असर पड़ा। किंगफिशर, जो पहले ही महंगे संचालन खर्च और आक्रामक विस्तार की वजह से वित्तीय दबाव में थी, इस संकट से उबर नहीं सकी।
मुख्य बिंदु:
विजय माल्या ने तत्कालीन वित्त मंत्री प्रणब मुखर्जी से कहा कि उन्हें एयरलाइन को छोटा करना पड़ेगा — मतलब कुछ प्लेन हटाने और कर्मचारियों की संख्या घटाने की योजना थी, ताकि लागत घटे और कंपनी टिकाऊ रह सके।
लेकिन सरकार ने उस वक्त दो अहम कारणों से इसे मना कर दिया:
(1) भारत में हवाई कनेक्टिविटी बनाए रखना जरूरी था।
(2) हजारों नौकरियां दांव पर थीं।
इसलिए, प्रणब मुखर्जी ने कहा कि बैंक मदद करेंगे और एयरलाइन चलती रहनी चाहिए।
माल्या का मानना है कि यहीं से वित्तीय दबाव और नुकसान बढ़ना शुरू हुआ, क्योंकि वो नुकसान में चल रही ऑपरेशंस को बंद नहीं कर पाए।
निष्कर्ष:
माल्या ने उस समय बिजनेस को "रिस्ट्रक्चर" करने की कोशिश की, लेकिन सरकार की सार्वजनिक हित से जुड़ी प्राथमिकताओं (जैसे रोज़गार और क्षेत्रीय कनेक्टिविटी) की वजह से यह संभव नहीं हो सका। इसका नतीजा यह हुआ कि एयरलाइन भारी घाटे में फंसती चली गई और अंततः बंद हो गई।
मुख्य वजहें जिनमें सरकार की भूमिका प्रमुख रही:
1. एटीएफ (Aviation Turbine Fuel) पर भारी टैक्स
2008 में क्रूड ऑयल की कीमतें $60 से $140 प्रति बैरल तक पहुंच गईं।
भारत में ATF की कीमत वैश्विक कीमत से काफी अधिक थी क्योंकि:
उस पर केंद्र और राज्य सरकारों द्वारा भारी टैक्स लगाया जाता था।
राज्यों ने उस पर 20% से लेकर 30% तक सेल्स टैक्स वसूला।
किंगफिशर और अन्य एयरलाइंस ने मांग की कि ATF को Declared Goods घोषित किया जाए (जिससे टैक्स 4% तक सीमित हो जाए), लेकिन केंद्र सरकार ने यह मंजूरी नहीं दी।
2. नीतिगत समर्थन की कमी
जब एयरलाइंस संकट में थीं, तब सरकार ने न तो राहत पैकेज दिया और न ही टैक्स छूट।
इसके उलट, कुछ अन्य देशों जैसे अमेरिका में सरकार ने एयरलाइंस को सब्सिडी, बेलआउट या टैक्स में राहत दी।
3. नीतिगत अस्पष्टता और राजनीतिक हस्तक्षेप
जैसे कि विजय माल्या का दावा है, उन्होंने एयरलाइंस को छोटा करने और कुछ रूट्स बंद करने की योजना बनाई थी, लेकिन तत्कालीन वित्त मंत्री ने "कनेक्टिविटी और नौकरियों" के नाम पर ऐसा करने से मना किया।
इससे कंपनी पर अपर्याप्त राजस्व और अधिक लागत का दबाव बढ़ा।
📉 नतीजा:
ATF लागत कुल ऑपरेशनल खर्च का 40% से भी अधिक हो गया।
किंगफिशर को भारी घाटा होने लगा, लेकिन सरकार की ओर से कोई ढील नहीं मिली।
टैक्स और महंगे फ्यूल के बोझ में एयरलाइन धीरे-धीरे ऋणजाल में फंसती गई।
✅ निष्कर्ष:
सरकारी नीतियों की कठोरता, महंगे फ्यूल पर टैक्स में राहत ना देना, और नीतिगत सहयोग की कमी — ये सब मिलकर किंगफिशर की डूबती नाव में और पानी भरते गए। यदि उस समय ATF को डिक्लेयर्ड गुड्स मान लिया जाता या टैक्स में कुछ राहत दी जाती, तो किंगफिशर और अन्य एयरलाइंस की हालत शायद कुछ हद तक सुधर सकती थी।
विदेशी निवेश की मंजूरी नहीं मिलना: विजय माल्या का कहना है कि उन्होंने एतिहाद एयरवेज के CEO से किंगफिशर एयरलाइंस में निवेश के लिए डील फाइनल कर ली थी। लेकिन सरकार ने उस समय उन्हें FDI (Foreign Direct Investment) की इजाजत नहीं दी।
अन्य एयरलाइंस को फायदा: ठीक 6 महीने बाद, जेट एयरवेज को एतिहाद से विदेशी निवेश की अनुमति मिल गई। इससे सरकार पर पक्षपात का आरोप लगता है।
"Perfect Storm" की स्थिति:
एक तरफ कच्चे तेल की कीमतें रिकॉर्ड ऊंचाई पर थीं,
एविएशन फ्यूल पर भारी टैक्स था,
सरकार ने राहत देने से इनकार किया,
और फिर विदेशी निवेश भी रोक दिया गया।
इन सब वजहों को मिलाकर विजय माल्या इसे “परफेक्ट स्टॉर्म” कहते हैं—यानी ऐसी परिस्थिति जिसमें कई नकारात्मक कारक एक साथ आकर किसी चीज़ को तबाह कर देते हैं।
यह बयान बताता है कि सिर्फ बिज़नेस की गलतियों से नहीं, बल्कि नीतिगत फैसलों और भेदभावपूर्ण रवैये ने भी किंगफिशर को डुबाने में अहम भूमिका निभाई।
"ग्लोबल क्राइसिस, महंगे एविएशन फ्यूल और सरकारी नीतियों ने मिलकर किंगफिशर को डुबो दिया। अगर हालात हमारे खिलाफ न होते, तो आज किंगफिशर भी इंडिगो और एयर इंडिया की तरह एक बड़ी एयरलाइन होती। लेकिन बिजनेस में कभी जीत होती है, कभी हार – यही इसका असली चेहरा है।"
"मैं उन सभी कर्मचारियों से दिल से माफी मांगता हूं जिन्हें किंगफिशर एयरलाइंस के बंद होने के कारण अपनी नौकरी गंवानी पड़ी या जिनकी सैलरी बकाया रह गई। यह मेरे जीवन के सबसे दर्दनाक अनुभवों में से एक है। मैं इसके लिए पूरी जिम्मेदारी लेता हूं और इस बात का गहरा अफसोस है कि मैं उस समय उनकी मदद नहीं कर सका। मेरी मंशा कभी किसी के साथ अन्याय करने की नहीं थी। अगर हालात और फैसले अलग होते, तो शायद हम सबकी किस्मत भी अलग होती।"
"मेरे पास कर्नाटक हाई कोर्ट में कुछ पैसे जमा थे, और मेरी स्पष्ट इच्छा थी कि उन पैसों से कर्मचारियों की बकाया सैलरी चुकाई जाए। मैंने अदालत से अनुमति मांगी, लेकिन बैंकों ने इसका विरोध किया और कोर्ट ने इजाजत नहीं दी। ये पैसे फ्रीज थे, और मैं चाहकर भी कुछ नहीं कर सका। मैं हरसंभव कोशिश करता रहा, लेकिन हालात मेरे नियंत्रण से बाहर थे।"
🎉 पार्टी का आयोजन ऐसे समय पर हुआ जब…
किंगफिशर एयरलाइंस बंद हो चुकी थी, और
हजारों कर्मचारियों की सैलरी बकाया थी,
साथ ही माल्या पर बैंकों का 9,000 करोड़ रुपये से अधिक का कर्ज बकाया था, जिसे उन्होंने चुकाया नहीं था।
🥂 पार्टी की भव्यता:
यह पार्टी 18 दिसंबर 2015 को गोवा में आयोजित की गई थी।
इसमें बॉलीवुड सितारे, मॉडल्स, विदेशी बैंड और हाई-प्रोफाइल मेहमान शामिल हुए।
इसे “extravagant” (फिजूलखर्ची भरी) और “बेशर्मी भरी धूमधाम” कहा गया।
जबकि देश में आम लोग और बैंक कर्मचारी माल्या से सवाल पूछ रहे थे।
🔥 विवाद का कारण:
सामाजिक असंवेदनशीलता – जब लोग आर्थिक नुकसान झेल रहे थे, कर्मचारियों को सैलरी नहीं मिली थी, तब इस तरह जश्न मनाना लोगों को गलत लगा।
प्रचार और मीडिया कवरेज – इस पार्टी की तस्वीरें और वीडियो सोशल मीडिया व न्यूज चैनलों पर वायरल हो गए, जिससे गुस्सा और बढ़ा।
राजनीतिक और कानूनी जांच जारी थी, और उसके बीच इस तरह का आयोजन बुरा संदेश देता था।
👉 नतीजा:
यह पार्टी विजय माल्या के “बिगड़ैल अमीर” (spoiled tycoon) की छवि को और मजबूत करती है। इसके बाद जांच एजेंसियों और बैंकों की नजरें उन पर और सख्त हो गईं।
"इन तीन सालों में मैं अपने कर्मचारियों को सैलरी देने के लिए बहुत प्रयास करता रहा, लेकिन अफसोस कि मैं कुछ कर नहीं सका। मेरी सारी संपत्तियाँ कोर्ट के आदेश पर फ्रीज थीं। अगर मैं कोई पैसा भी इंफ्यूज करता, तो वह सीधे बैंकों द्वारा जब्त कर लिया जाता। मेरे वकीलों ने हर कानूनी रास्ता तलाशा ताकि कर्मचारियों को भुगतान किया जा सके, लेकिन कानून की सीमाओं के आगे हम बेबस थे। यह मेरी जिंदगी का सबसे बड़ा दुख है कि मैं अपने कर्मचारियों को वह न्याय नहीं दिला सका, जिसके वे हकदार थे।"
"मैंने कभी नहीं कहा कि मैं पैसे नहीं दूंगा। सुप्रीम कोर्ट के रिकॉर्ड में मेरे ऑफर दर्ज हैं। मैंने 2012 से 2015 तक बैंकों को चार बार सेटलमेंट का ऑफर दिया, लेकिन उन्होंने ठुकरा दिया।"
इस बयान के मुख्य बिंदु:
इरादा स्पष्ट करना:
माल्या यह स्पष्ट करना चाहते हैं कि उन्होंने कभी कर्ज न चुकाने की बात नहीं की। वे खुद को "जानबूझकर डिफॉल्टर" कहलाने का विरोध करते हैं।
ऑफर की बात:
उनके अनुसार, 2012 से 2015 तक उन्होंने कम-से-कम चार बार बैंकों को सेटलमेंट (समझौता) का प्रस्ताव दिया।
– ये ऑफर सुप्रीम कोर्ट में भी रिकॉर्ड पर हैं।
– लेकिन बैंक इन्हें "स्वीकार्य" नहीं मानते थे।
बैंकों की असहमति:
माल्या के दावे के अनुसार, बैंकों ने उनके ऑफर्स को बार-बार नकार दिया, जिससे निपटारा नहीं हो सका।
विजय माल्या का यह बयान इस पूरे मामले की एक अहम पेचीदगी को सामने लाता है। उन्होंने कहा:
"बैंकों ने मेरे 5,000 करोड़ के ऑफर को ठुकराया, क्योंकि वो 14,100 करोड़ वसूलना चाहते थे। अगर वो मेरा ऑफर मान लेते, तो उन्हें 5,000 करोड़ मिलते। अब उन्होंने मेरी संपत्ति बेचकर 14,100 करोड़ ले लिए।"
इसमें वह दो बातें कह रहे हैं:
सेटलमेंट का ऑफर: माल्या का दावा है कि उन्होंने समय रहते 5,000 करोड़ रुपये का सेटलमेंट ऑफर दिया था, लेकिन बैंकों ने उसे अस्वीकार कर दिया क्योंकि वे पूरी वसूली (14,100 करोड़ रुपये) चाहते थे।
वसूली हो गई: अब बैंकों ने माल्या की संपत्तियाँ जब्त करके कुल 14,100 करोड़ रुपये वसूल कर लिए — जो उन्होंने मूल लोन, ब्याज और जुर्माने के रूप में मांगा था।
इसका मतलब क्या निकाला जा सकता है?
माल्या का तर्क: अगर बैंक उस समय ऑफर स्वीकार कर लेते, तो विवाद जल्दी खत्म हो जाता और लंबी कानूनी प्रक्रिया की ज़रूरत नहीं पड़ती।
बैंकों की स्थिति: उन्होंने कानून के मुताबिक लोन वसूली की प्रक्रिया चलाई और अंततः पूरी रकम वसूल ली — भले इसमें वक्त और कानूनी लड़ाई लगी हो।
कुछ महत्वपूर्ण सवाल:
अगर वाकई 14,100 करोड़ वसूले जा चुके हैं, तो क्या अब भी विजय माल्या के खिलाफ कानूनी कार्रवाई जारी रहनी चाहिए?
क्या बैंकों ने जानबूझकर सेटलमेंट का ऑफर ठुकराकर केस लंबा किया, या उन्हें पूरा भरोसा था कि पूरी रकम वसूली जा सकती है?
यह बयान माल्या की "मैं चोर नहीं हूं" वाली दलील को मज़बूत करने की कोशिश भी है — कि आख़िरकार बैंक तो पैसा निकाल ही चुके हैं, तो उन्हें दोषी ठहराना कहां तक जायज़ है?
विजय माल्या ने बैंकों के लोन और रिकवरी को लेकर कई अहम बातें कहीं, जिनका सार निम्नलिखित है:
सेटलमेंट ऑफर दिए थे:
माल्या ने दावा किया कि उन्होंने 2012 से 2015 के बीच चार बार बैंकों को सेटलमेंट ऑफर दिया। उनका कहना है कि उन्होंने कभी यह नहीं कहा कि वो पैसा नहीं देंगे। उनके ऑफर सुप्रीम कोर्ट के रिकॉर्ड में भी दर्ज हैं।
5,000 करोड़ का ऑफर ठुकराया गया:
उन्होंने कहा कि उन्होंने बैंकों को 5,000 करोड़ रुपये लौटाने की पेशकश की थी, लेकिन बैंकों ने इसे ठुकरा दिया क्योंकि वे 14,100 करोड़ की वसूली करना चाहते थे।
बैंकों ने संपत्ति बेचकर पैसा वसूला:
माल्या का कहना है कि बैंकों ने अब उनकी संपत्तियां बेचकर वही 14,100 करोड़ रुपये वसूल लिए हैं, जो वे पहले भी 5,000 करोड़ में पा सकते थे। उनके मुताबिक, अगर बैंकों ने तब उनका ऑफर स्वीकार कर लिया होता, तो मामला वहीं खत्म हो जाता।
संपत्ति फ्रीज होने से सीमाएं:
उन्होंने यह भी कहा कि कोर्ट ने उनकी संपत्तियां फ्रीज कर दी थीं, जिसकी वजह से वो कर्मचारियों को पैसे नहीं दे सके। उन्होंने जो भी पैसा डालने की कोशिश की, वो भी बैंक ले लेते।
इन बयानों से माल्या यह संदेश देना चाहते हैं कि वे भुगतान करने को तैयार थे, लेकिन बैंकों और सिस्टम ने उनकी पेशकशों को स्वीकार नहीं किया, जिससे विवाद लंबा खिंच गया।
विजय माल्या ने अपने इंटरव्यू में जो दावा किया, उसमें उन्होंने डेट रिकवरी ट्रिब्यूनल (DRT) द्वारा जारी किए गए एक सर्टिफिकेट का हवाला दिया, जिसमें उनके ऊपर कुल ₹6,203 करोड़ का कर्ज बताया गया है। इस राशि में 11.5% का ब्याज भी शामिल है।
इसका मतलब क्या है?
यह ₹6,203 करोड़ की रकम मूल लोन राशि + ब्याज (11.5%) को मिलाकर है।
DRT का सर्टिफिकेट एक कानूनी दस्तावेज होता है, जिसमें यह तय किया जाता है कि डिफॉल्टर ने कितना कर्ज बकाया रखा है।
माल्या इसी सर्टिफिकेट को आधार बनाकर यह कहते हैं कि:
"मेरा कुल बकाया 6,203 करोड़ था, जबकि बैंकों ने मेरी संपत्तियां बेचकर उससे कहीं ज्यादा — ₹14,000 करोड़ से ज्यादा वसूल लिए।"
इससे जुड़ा तर्क:
माल्या का तर्क है कि अगर उनका सेटलमेंट ऑफर पहले स्वीकार कर लिया गया होता (₹5,000 करोड़ के आस-पास), तो बैंकों को लंबी कानूनी प्रक्रिया नहीं झेलनी पड़ती।
लेकिन बैंकों और जांच एजेंसियों का कहना है कि:
उनकी कुल देनदारी (interest + penalty + default charges) मिलाकर ₹9,000 करोड़ से ज्यादा थी।
संपत्तियां जब्त कर बेचना कानूनी प्रक्रिया का हिस्सा था।
यदि चाहें, तो मैं DRT ऑर्डर का विश्लेषण या इसका कानूनी महत्व भी विस्तार से समझा सकता हूँ।
यह बयान विजय माल्या के उस दावे की ओर इशारा करता है जिसमें वे अपने ऊपर बताए जा रहे कुल कर्ज को चुनौती देते हैं।
जब वे कहते हैं —
“ये आधिकारिक कर्ज की रकम है। लोग 9,000 करोड़ की बात करते हैं, पर मुझे नहीं पता ये नंबर कहां से आया।” —
तो उनका मतलब है कि:
उन्होंने डेट रिकवरी ट्रिब्यूनल (DRT) का प्रमाण प्रस्तुत किया है, जिसमें उनके ऊपर करीब ₹6,203 करोड़ का कर्ज बताया गया है (जिसमें 11.5% ब्याज भी शामिल है)।
लेकिन आमतौर पर मीडिया या सरकारी एजेंसियां ₹9,000 करोड़ या उससे ज़्यादा का आंकड़ा बताती हैं, जिसे वे "गलत या अनाधिकारिक" मानते हैं।
वे यह बताना चाहते हैं कि उनके मुताबिक वास्तविक और कानूनी रूप से मान्य कर्ज की रकम इससे कम है, और बाकी आंकड़े "प्रोपेगैंडा" या "वास्तविकता से अलग" हैं।
यह बयान उनकी छवि सुधारने की कोशिश और कर्ज विवाद में खुद का पक्ष स्पष्ट करने का हिस्सा है।
अगर चाहें तो मैं यह भी बता सकता हूँ कि ₹9,000 करोड़ का आंकड़ा किस आधार पर मीडिया और एजेंसियों द्वारा बार-बार दोहराया गया है।
बैंकों ने मुझे कभी अकाउंट का स्टेटमेंट नहीं दिया। ये दुनिया में शायद पहला मामला है कि बैंक लोन लेने वाले को हिसाब नहीं देता।
2024 में वित्त मंत्रालय की रिपोर्ट में कहा गया कि ED ने माल्या से 14,131.66 करोड़ की संपत्ति बैंकों को लौटाई। माल्या पूछते हैं, “उन्होंने कौन सी संपत्ति बेची? मुझे कुछ पता नहीं। मेरे वकीलों ने कई बार स्टेटमेंट मांगा, SBI के चेयरमैन को चिट्ठी लिखी, पर कोई जवाब नहीं।”
CBI ने ब्रांड वैल्यूएशन और प्राइवेट जेट के "मिसयूज" का आरोप लगाया। ED ने 3,547 करोड़ की मनी लॉन्ड्रिंग का इल्ज़ाम लगाया। लेकिन एयरलाइन के 50% खर्चे विदेशी मुद्रा में थे, इसे मनी लॉन्ड्रिंग कहना बकवास है। IDBI को भी मैंने 900 करोड़ का लोन चुका दिया।
लोग मुझे “भगोड़ा” कहते हैं, लेकिन ये सब गलत है। मैं 1988 से इंग्लैंड में रह रहा हूं और 1992 से मेरे पास वहां की परमानेंट रेजिडेंसी (ILR) है। नियमों के हिसाब से मैं भारत में सिर्फ 180 दिन ही रुक सकता हूं, इसलिए बार-बार बाहर आता-जाता था।
मैं कोई भगोड़ा नहीं हूं, मैं तो 32 साल से यूके का रेजिडेंट हूं। मैंने फाइनेंस मिनिस्टर अरुण जेटली को बताया कि मैं लंदन जा रहा हूं। मैं संसद से एयरपोर्ट गया। मुझे जेनेवा में FIA वर्ल्ड काउंसिल की मीटिंग के लिए जाना था, जो महीनों पहले तय थी।
मैंने जेटली से कहा कि बैंकों से मेरी सेटलमेंट की बात करवाओ, मैं वापस आऊंगा। लेकिन मीडिया में हंगामा मच गया। जेटली ने पहले मुलाकात से इनकार किया, फिर एक कांग्रेसी MP ने कहा, मैंने उन्हें साथ देखा। तब जेटली ने माना कि हां, एक छोटी-सी मुलाकात हुई।
मैंने विदेशी पार्टनर्स के साथ शेयर बेचने की बात की ताकि बैंकों का कर्जा चुकाऊं। मैं ED को लिखा कि मुझे वक्त दो, मैं CBI के सामने पेश हो चुका हूं, आपके सामने भी आऊंगा। लेकिन तभी मेरा पासपोर्ट रद्द कर दिया गया। पासपोर्ट रद्द होने से मैं लंदन में ही अटक गया।
मैंने कोई चोरी नहीं की। मैंने कभी पर्सनल लोन नहीं लिया, न ही किसी को धोखा दिया। बैंकों ने मेरी 14,100 करोड़ रुपए की संपत्ति जब्त कर ली, फिर भी चोर कहते हैं। एक तरफ मेरी संपत्ति जब्त करो, दूसरी तरफ चोर कहो, ये कैसे चलेगा?
मैं भारत की नौकरशाही को बिजनेस की बड़ी रुकावट मानता हूं। 29 राज्यों की अलग-अलग नीतियों से निपटना पड़ता था। राजनेता चुनाव में शराब, नकदी मांगते थे। मैंने सिर्फ शराब दी, क्योंकि मेरी कंपनी सबसे बड़ी थी। मैंने रिश्वत नहीं दी।
माल्या की आज की जिंदगी और भविष्य की योजनाएं क्या हैं?
मैं लंदन में छह कुत्तों के साथ समय बिताता हूं। मुझे कुत्ते बहुत पसंद हैं, मैं उनके साथ खूब खेलता हूं। मेरे पास कुछ क्लासिक कारें हैं, जिन्हें ठीक करने में मजा आता हैं। पास प्रॉपर्टी के बगल में एक ऑफिस भी है, जहां स्टाफ काम करता है।
यहां मैं अपने चल रहे बिजनेस पर नजर रखता हूं। कोर बिजनेस अभी भी शराब और ब्रूअरी से जुड़ा है। मैं कानूनी लड़ाई लड़ रहा हूं। निष्पक्ष सुनवाई मिले, तो भारत लौटने पर विचार करूंगा। अगर जेल नसीब है, तो सामना करूंगा।
मैं चाहता हूं कि लोग मुझे मेरे अच्छे कामों के लिए याद रखें, न कि किसी चोर के तौर पर।
मैंने सबरीमाला और तिरुपति मंदिरों में सोना दान किया। मैं भगवान पर भरोसा करता हूं। अगर यह कठिन समय उनकी मर्जी है, तो मैं स्वीकार करता हूं।
Comments
Post a Comment